कौन हैं जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ?
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज एक महान आध्यात्मिक गुरु थे जिन्होंने भक्ति योग (ईश्वर के प्रति प्रेम और समर्पण का मार्ग) को पुनः स्थापित किया और इसे परम आनंद प्राप्त करने का सबसे सहज साधन बताया।

भारतीय आध्यात्मिक परंपरा और वैदिक दर्शन के इतिहास में उनका स्थान अद्वितीय है। वे तीन विशेषताओं के कारण सदैव स्मरण किए जाते हैं—
- वेदों का अपार ज्ञान, जिसके कारण उन्हें जगद्गुरु की उपाधि प्रदान की गई।
- श्री राधा-कृष्ण के प्रति अटूट प्रेम, जिसके लिए उन्हें रसिक संत कहा गया।
- करुणा और कृपा से परिपूर्ण स्वभाव, जिसकी वजह से लोग उन्हें कृपा अवतार मानते हैं।
वे केवल गुरु ही नहीं, बल्कि मार्गदर्शक, दार्शनिक और सच्चे मित्र के रूप में असंख्य लोगों के जीवन को प्रभावित करते रहे। आज भी उनकी शिक्षाएँ और आदर्श जगद्गुरु कृपालु परिषद् के माध्यम से जीवंत हैं, जो न केवल आध्यात्मिक ज्ञान का प्रचार-प्रसार करती है बल्कि समाज-सेवा और परोपकार के अनेक कार्यों में भी सक्रिय है।
जगद्गुरु उपाधि क्या है?
‘जगद्गुरु’ सनातन धर्म में प्रयुक्त एक अत्यंत प्रतिष्ठित उपाधि है, जिसका शाब्दिक अर्थ है – ‘समस्त जगत् का गुरु’ या ‘ब्रह्मांड का आचार्य’।
महाभारत में अर्जुन स्वयं भगवान श्रीकृष्ण को संबोधित करते हुए कहते हैं –
“कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्।”
अर्थात्, भगवान श्रीकृष्ण ही आद्य एवं सर्वोच्च जगद्गुरु हैं।
यह परंपरा अत्यंत प्राचीन और पूजनीय मानी जाती है। सामान्य जन के लिए यह पहचानना सरल नहीं है कि कौन-सा संत वास्तव में ईश्वर-तत्त्व को प्राप्त कर चुका है और कौन दिव्य स्वरूप से अवगत है। इसी कठिनाई को दूर करने हेतु वैदिक आचार्यों और विद्वानों ने जगद्गुरु उपाधि प्रदान करने की परंपरा प्रारंभ की, जिससे सच्चे संत और ईश्वर-साक्षात्कारी महापुरुष की पहचान हो सके।

जगद्गुरु परंपरा में पाँच मूल आचार्य
आधुनिक काल से पहले केवल चार महापुरुषों को ही मूल जगद्गुरु के रूप में मान्यता दी गई थी—
- जगद्गुरु श्री शंकराचार्य (509–477 ईसा पूर्व)
- जगद्गुरु श्री रामानुजाचार्य (1017–1137 ईस्वी)
- जगद्गुरु श्री निम्बार्काचार्य (1130–1200 ईस्वी)
- जगद्गुरु श्री मध्वाचार्य (1238–1317 ईस्वी)
इसके बाद, वर्ष 1957 में जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज को यह अद्वितीय उपाधि प्रदान की गई। इस प्रकार वे इतिहास में पाँचवें मूल जगद्गुरु बने।
पहले चार जगद्गुरुओं ने अपने जीवनकाल में उत्तराधिकार की परंपरा स्थापित की थी। किंतु, जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज को यह उपाधि उनके स्वयं के दिव्य ज्ञान, साधना और योग्यता के आधार पर मिली। उनका पूर्ववर्ती चार जगद्गुरुओं की परंपरा से कोई औपचारिक संबंध नहीं था, बल्कि उन्होंने अपने बल पर यह गौरव प्राप्त किया।
पांचवें मूल जगद्गुरू

काशी विद्वत् परिषद् और जगद्गुरु की उपाधि
काशी विद्वत् परिषद् वैदिक विद्वानों की सबसे प्रमुख संस्था मानी जाती है। इसमें लगभग 500 विद्वान सम्मिलित हैं, जिन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा 3 से 6 शास्त्रों के गहन अध्ययन और साधना में व्यतीत किया है।
14 जनवरी 1957 को इन 500 विद्वानों ने सर्वसम्मति से घोषणा की कि श्री कृपालु जी महाराज का ज्ञान उन सबके सामूहिक ज्ञान से भी अधिक है। इसी अवसर पर उन्हें अत्यंत प्रतिष्ठित उपाधि ‘जगद्गुरु’ से विभूषित किया गया। उस समय कृपालु जी महाराज की आयु मात्र 34 वर्ष थी।
काशी विद्वत् परिषद् ने उन्हें न केवल जगद्गुरु, बल्कि ‘जगद्गुरुत्तम’ अर्थात् सभी जगद्गुरुओं में सर्वोच्च घोषित किया। साथ ही उन्हें कई अन्य आदरणीय उपाधियाँ भी प्रदान की गईं, जिनमें शामिल हैं—
- श्रिमत-पदवाक्य-प्रमाण-परावरिण – जो व्याकरण (पद), वैशेषिक (वाक्य) और न्याय (प्रमाण) में प्रतिपादित सभी दर्शनों के पारंगत आचार्य हों।
- वेदमार्ग-प्रतिष्ठापन-आचार्य – जो वेदों और हिंदू शास्त्रों में वर्णित ईश्वर प्राप्ति के वास्तविक मार्ग की स्थापना करें।
- निखिलदर्शन-समन्वय-आचार्य – जो हिंदू शास्त्रों और वेदों में प्रतिपादित सभी दर्शन का सामंजस्य कराते हों।
- सनातन-वैदिक-धर्म-प्रतिष्ठापन-सत्सम्प्रदाय-परमाचार्य – जो सनातन वैदिक धर्म को प्रतिष्ठित करने वाले और सभी प्रामाणिक वैदिक सम्प्रदायों के परमाचार्य हों।
- भक्ति योग-रसावतार – जो भक्ति योग और दिव्य प्रेमरस के साकार अवतार हों।
- भगवदानन्त-श्रीविभूषित – जो ईश्वर की अनंत दिव्य विभूतियों से अलंकृत हों।
इन सब उपाधियों से विभूषित होकर वे जगद्गुरु 1008 स्वामी श्री कृपालु जी महाराज के रूप में विश्वभर में परम आध्यात्मिक गुरु के रूप में पूजित हुए।
जगद्गुरु आदेश
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज का संदेश
आपका अंतिम लक्ष्य श्रीकृष्ण के दिव्य प्रेम की प्राप्ति और उनकी शाश्वत सेवा होना चाहिए। यह दिव्य प्रेम केवल आपके गुरु की कृपा से ही प्राप्त हो सकता है।
आपके गुरु की कृपा तभी मिलेगी जब हृदय पूर्णतः शुद्ध होगा। और हृदय की शुद्धि केवल उसी भक्ति साधना से संभव है, जो आपके गुरु द्वारा बताई गई हो।
साधना – श्री राधा-कृष्ण के दिव्य दर्शन और दिव्य प्रेम की उत्कट लालसा में आँसू बहाना, उनके नाम, गुण, और लीलाओं का गान करना, तथा रूपध्यान (श्री राधा-कृष्ण के दिव्य स्वरूप का ध्यान) करना। आप किसी भी स्वरूप का ध्यान कर सकते हैं, पर जिस स्वरूप का ध्यान करें, उसे दिव्य ही अनुभव करें।
हमेशा यह अनुभव करें कि भगवान श्रीकृष्ण आपके साथ हैं। सभी इच्छाओं को त्याग दें, यहाँ तक कि मुक्ति की इच्छा को भी।
भक्ति का अभ्यास केवल इस भावना से करें कि आपको निष्काम दिव्य प्रेम प्राप्त हो। दृढ़ विश्वास रखें कि श्रीकृष्ण ही आपके हैं और उनके प्रति अपनी तड़प को और प्रगाढ़ करें।
आध्यात्मिक जीवन में दोष-दर्शन जैसी भूलों से बचें और मानव जीवन के प्रत्येक क्षण को अनमोल समझें।
मैं सदैव आपके मार्गदर्शन हेतु उपस्थित रहूँगा।
– आपका,
कृपालु

कृपालु जी द्वारा निर्मित मंदिर
कृपालु जी फोटो गैलरी











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